एक लम्हा मानो गुजरा और सवाल कर गया |
मेरे मुरझाये चेहरे को देख कटाक्ष कर गया ||
वो अनकहा पल नाजाने क्यों मुझे होश में ले आया |
और मेरे रास्ते से भटके होने का एहसास करा आया ||
साहस की जगह डर की ऊँगली थामे चल रहा था मैं |
शायद इसीलिए मुरझाये चेहरे को अपनाये चल रहा था मैं ||
परन्तु आज फिर से दिल ने उमँग की डोरी पकड़ी है |
और भुला चुके साथी साहस की ऊँगली थामी है ||
सो ऐ मेरी मंजिल, तू आज तट से कोसों दूर ही सही |
तेरे तक पहुँचने में इस चेहरे पे मुरझाहट दोबारा नहीं लानी है ||
Friday, April 29, 2011
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