Monday, August 15, 2011

'हिंद - एक सपना'

आज मेरा हिंद बड़ी मुश्किलों में है |
एक की मैं क्या बताऊँ सब ने नोचा मिल के है ||

गाँधी ने सीचा था जो सपना, अज बड़ा बेबस सा है |
दूर पड़ा किसी कोने में, अज बड़ा हथप्रभ सा है ||

भ्रष्ट नहीं है नेता केवल, 'केवल' तो बस एक मिथ्या है |
दोषारोपण में निपुण अब, झांकता कौन खुद में है ||
झांके तो जाने कि नेता आज हर घर घर में है ||

भगत सिंह की वीरता अब गलत माथों पे है |
हर गली इस देश की तभी तो अब आतंक में है ||
गैरों को हम क्या कहें, जब देश ही खुद बगावत पे है |
जहाँ नहीं नक्सल का दंगल, वह गोधरा लपटों में है ||
कर्रहा रहा इस देश का हर मानुष रक्षक को है |
क्या करें किस पर भरोसा, हर रक्षक भक्षक ही तो है ||

हर कोई बस 'मैं' में जीता, 'हम' तो बस अब कल में है |
कल तक थे लड़ते जातियों पे, आज नदी नालों पे हैं |
आज कहीं सतलज पे दंगे तो कहीं नर्मदा पे हैं ||

सपना साक्षरता का लगता है अब सच होने को है |
पढ़े लिखों की संख्यां दिन पे दिन बढ़ने को है ||
पर आज भी क्यों मतदाता इन जातियों की उलझन में है |
शायद आज भी मेरा प्रजातंत्र इसीलिए बैसाखियों पे है ||

आज मेरा हिंद बड़ी मुश्किलों में है |
एक की मैं क्या बताऊँ सब ने नोचा मिल के है ||
आओ मिलकर के बनाये एक साचा भारत जो दिल में है |
एक एक कर के मिटा दे सारी खामियां जो हम में है |
क्योंकि आज मेरा हिंद बड़ी मुश्किलों में है ||

Monday, May 16, 2011

बगावत

यूँ ही बैठे बैठे निगाहों ने आज पैरों को देख लिया,
थोड़े नाराज दिखे तो कारण पूछ लिया |
अपनी थकावट का उलाहना देने लगे वो ,
कब तक भगाओगे हमें ये पूछने लगे वो |
अपने मन का न सही हमारे का तो ख्याल करो ,
कब से भाग रहे हो थोडा तो आराम करो |
दिल में झाँका तो उसने भी चुपके से गर्दन हिला दी,
अरे ये क्या इसने भी आराम के लिए अर्जी बढ़ा दी |
देखते ही देखते बाकि भी जज्बाती हो गए ,
और सर से लेकर पाऊं तक सभी बागी हो गए |
मौके को नाजुक जन मैंने भी परिस्थिथि संभाली ,
और उनके सुस्ताने की बात तुरंत स्वीकारी |
तत्काल प्रभाव से सभी को सुस्ताने भेज दिया ,
और अपने ठोस संचालन का नमूना पेश किया |
सवेरा होते ही सबको मना लूँगा मैं ,
और मंजिल आने तक साथ देने की कसम खिला लूँगा मैं |
क्योंकि मजधार में यूँ अपने साथ छोड़ा नहीं करते ,
और मंजिल आने से पहले मुसाफिर दम तोड़ा नहीं करते ||

Friday, April 29, 2011

मुस्कराहट

एक लम्हा मानो गुजरा और सवाल कर गया |
मेरे मुरझाये चेहरे को देख कटाक्ष कर गया ||
वो अनकहा पल नाजाने क्यों मुझे होश में ले आया |
और मेरे रास्ते से भटके होने का एहसास करा आया ||
साहस की जगह डर की ऊँगली थामे चल रहा था मैं |
शायद इसीलिए मुरझाये चेहरे को अपनाये चल रहा था मैं ||
परन्तु आज फिर से दिल ने उमँग की डोरी पकड़ी है |
और भुला चुके साथी साहस की ऊँगली थामी है ||
सो ऐ मेरी मंजिल, तू आज तट से कोसों दूर ही सही |
तेरे तक पहुँचने में इस चेहरे पे मुरझाहट दोबारा नहीं लानी है ||

होंसला

टूटती हुई उमीदो के दामन को थामूं कैसे |
अधर में फँसी अपनी कश्ती किनारे लगाऊं कैसे ||
कभी तो रुकेगा तूफ़ान और कभी तो दिखेगा क्षितिज |
बस इसी उम्मीद से नाविक का धर्म निभाए जा रहा हू ||

उम्मीद

आज यूँ अकस्मात् ही एक लहर सी उठी है |
मन में तरंग है तथा आँखों में सिमटी उमीदें |
तूफ़ान भी आज मंद है और मेघ भी हैं नदारद |
नाविक के इस सफ़र में आज क्षितिज भी धुंधला नहीं |
शायद पतवार-ऐ-उम्मीद से है आज कश्ती का खेवन||

P.S.
अकस्मात् - Suddenly, तरंग - waves, क्षितिज - horizon, पतवार - oar, कश्ती - boat, खेवन - sailing,

साथी

चलो इस मैदान में आज हम ही अकेले नहीं,
खिलाडी और भी है जिनसे मुकद्दर रुसवा है |

अंधकार

इस हाल ऐ जिन्दगी पर अब तो लिख़ा भी नहीं जाता |
जिस कलम से प्यार था उसे भी अब पकड़ा नहीं जाता ||
किस्मत की इस आँख मिचोली में साफ़ भी धुंधला हो गया |
कल तक जो दिखाई देता था आज वो भी दिखना बंद हो गया ||