Friday, April 29, 2011

मुस्कराहट

एक लम्हा मानो गुजरा और सवाल कर गया |
मेरे मुरझाये चेहरे को देख कटाक्ष कर गया ||
वो अनकहा पल नाजाने क्यों मुझे होश में ले आया |
और मेरे रास्ते से भटके होने का एहसास करा आया ||
साहस की जगह डर की ऊँगली थामे चल रहा था मैं |
शायद इसीलिए मुरझाये चेहरे को अपनाये चल रहा था मैं ||
परन्तु आज फिर से दिल ने उमँग की डोरी पकड़ी है |
और भुला चुके साथी साहस की ऊँगली थामी है ||
सो ऐ मेरी मंजिल, तू आज तट से कोसों दूर ही सही |
तेरे तक पहुँचने में इस चेहरे पे मुरझाहट दोबारा नहीं लानी है ||

होंसला

टूटती हुई उमीदो के दामन को थामूं कैसे |
अधर में फँसी अपनी कश्ती किनारे लगाऊं कैसे ||
कभी तो रुकेगा तूफ़ान और कभी तो दिखेगा क्षितिज |
बस इसी उम्मीद से नाविक का धर्म निभाए जा रहा हू ||

उम्मीद

आज यूँ अकस्मात् ही एक लहर सी उठी है |
मन में तरंग है तथा आँखों में सिमटी उमीदें |
तूफ़ान भी आज मंद है और मेघ भी हैं नदारद |
नाविक के इस सफ़र में आज क्षितिज भी धुंधला नहीं |
शायद पतवार-ऐ-उम्मीद से है आज कश्ती का खेवन||

P.S.
अकस्मात् - Suddenly, तरंग - waves, क्षितिज - horizon, पतवार - oar, कश्ती - boat, खेवन - sailing,

साथी

चलो इस मैदान में आज हम ही अकेले नहीं,
खिलाडी और भी है जिनसे मुकद्दर रुसवा है |

अंधकार

इस हाल ऐ जिन्दगी पर अब तो लिख़ा भी नहीं जाता |
जिस कलम से प्यार था उसे भी अब पकड़ा नहीं जाता ||
किस्मत की इस आँख मिचोली में साफ़ भी धुंधला हो गया |
कल तक जो दिखाई देता था आज वो भी दिखना बंद हो गया ||