आज यूँ अकस्मात् ही एक लहर सी उठी है |
मन में तरंग है तथा आँखों में सिमटी उमीदें |
तूफ़ान भी आज मंद है और मेघ भी हैं नदारद |
नाविक के इस सफ़र में आज क्षितिज भी धुंधला नहीं |
शायद पतवार-ऐ-उम्मीद से है आज कश्ती का खेवन||
P.S.
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Friday, April 29, 2011
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