Monday, May 16, 2011

बगावत

यूँ ही बैठे बैठे निगाहों ने आज पैरों को देख लिया,
थोड़े नाराज दिखे तो कारण पूछ लिया |
अपनी थकावट का उलाहना देने लगे वो ,
कब तक भगाओगे हमें ये पूछने लगे वो |
अपने मन का न सही हमारे का तो ख्याल करो ,
कब से भाग रहे हो थोडा तो आराम करो |
दिल में झाँका तो उसने भी चुपके से गर्दन हिला दी,
अरे ये क्या इसने भी आराम के लिए अर्जी बढ़ा दी |
देखते ही देखते बाकि भी जज्बाती हो गए ,
और सर से लेकर पाऊं तक सभी बागी हो गए |
मौके को नाजुक जन मैंने भी परिस्थिथि संभाली ,
और उनके सुस्ताने की बात तुरंत स्वीकारी |
तत्काल प्रभाव से सभी को सुस्ताने भेज दिया ,
और अपने ठोस संचालन का नमूना पेश किया |
सवेरा होते ही सबको मना लूँगा मैं ,
और मंजिल आने तक साथ देने की कसम खिला लूँगा मैं |
क्योंकि मजधार में यूँ अपने साथ छोड़ा नहीं करते ,
और मंजिल आने से पहले मुसाफिर दम तोड़ा नहीं करते ||

7 comments:

Unknown said...

AWESOME.....
Iss sundar kavita ke liye tumhe mera Ashirwad....

Anshul Goel said...

bahut bahut dhanyvad hai :) :)

Shailesh Mishra said...

Bahut Sahi dost!!! Everything is very good. I specially liked the Flow and Continuity. Keep it up :)

Anshul Goel said...

thnx mishra ji :) :) bahut dhanyavad

Anshul Goel said...

bahut thnx brhter :)

Revati Sukumar said...

happened to read your kavita.. fantastic, very well written.. kaafi depth hai ismein :) amazing!

Anshul Goel said...

@Rev: many thanks for time and ur kind appreciation :) :)